कोई कछु कहो रे रंग लाग्यो,
रंग लाग्यो भ्रम भाग्यो ।।टेक।।
लोक कहैं मीराँ भई बाबरी भ्रम दूनी ने खाग्यो।
कोई कहै रंग लाग्यो। मीराँ साधाँ में यूँ रम बैठी, ज्यूँ गुदड़ी में तागो।
सोने में सुहागो। मीराँ लूती अपने भवन में, सतगुरू आप जगाग्यो। ज्ञानी गुरू आप जगाग्यो।।
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