Wednesday, August 30, 2023
Tuesday, August 29, 2023
दया करो ला जद आऊं मारा दाता ,
महर करो ला , जद आऊंला।
तू मेरा दाता मैं तेरा मंगता ,
तेरा ही दास कहाऊंगा।
ए भूखा प्यासा की तोहे खबर है
तू देगा में पाउँगा
दया करो ला जद आऊं मारा दाता ,
महर करो ला , जद आऊंला।
गंगा नहीं नहाऊं जमना नहीं न्हाऊ ,
ओर तीरथ न जाऊं ला
अड़ सठ तीर्थ मारा गुरु चरणा में
यहीं बैठ कर न्हाऊ ला
दया करो ला जद आऊं मारा दाता ,
महर करो ला , जद आऊंला।
पान न तोडू पत्थर नहीं पूजूँ
न कोई जीव सातउ ला
पात पात में बसे निरञ्जन
नित उठ दर्शन पाऊँ ला
दया करो ला जद आऊं मारा दाता ,
महर करो ला , जद आऊंला।
गगन मंडल में धूणी रामऊ
सुखमण मांड मण्डाऊ ला
पीवत पीवत मारी सुरतां जागी
मतवालो संत कहउँ ला
दया करो ला जद आऊं मारा दाता ,
महर करो ला , जद आऊंला।
जोगी नहीं होऊ ,जटा न बढ़ाऊ ,
न कोई भस्म रमाऊँ ला
मछन्दर प्रताप जति गौरख बोले
जोट में जोट मिलाउ ला
दया करो ला जद आऊं मारा दाता ,
महर करो ला , जद आऊंला।
ए भूखा प्यासा की तोहे खबर है
तू देगा में पाउँगा
मोहन आओ तो सही गिरधर आओ तो सही
माधव रे मंदिर में मीरा बाई ऐकली खड़ी
थे केहवो तो सांवरा मैं मोर मुकुट बन जाऊं
पेहरण लागे साँवरों रे, मस्तक पर राम जाऊं, वारे
मोहन आओ तो सही गिरधर आओ तो सही
माधव रे मंदिर में मीरा बाई ऐकली खड़ी
थे केहवो तो सांवरा मैं काजलियो बन जाऊं
नैन लगावे साँवरों रे, नैना में रम जाऊं, वारे
मोहन आओ तो सही गिरधर आओ तो सही
माधव रे मंदिर में मीरा बाई ऐकली खड़ी
थे केहवो तो सांवरा मैं जल जमुना बन जाऊं
न्हावन लागे साँवरों रे, अंग अंग रम जाऊं रे, म्हें तो
मोहन आओ तो सही गिरधर आओ तो सही
माधव रे मंदिर में मीरा बाई ऐकली खड़ी
थे केहवो तो सांवरा मैं पुष्प हार बन जाऊं
कंठ में पहरे साँवरों रे, हिवड़ा पर रम जाऊं, म्हें तो
मोहन आओ तो सही गिरधर आओ तो सही
माधव रे मंदिर में मीरा बाई ऐकली खड़ी
थे केहवो तो सांवरा मैं पग पायल बन जाऊं
नाचन लागे साँवरों रे, चरणा में रम जाऊं, म्हें तो
मोहन आओ तो सही गिरधर आओ तो सही
माधव रे मंदिर में मीरा बाई ऐकली खड़ी
श्याम पिया मोरी रंग दे चुनरिया ।। टेर ।।
ऐसी वो रंग दे रंग नाई छूटे,
धोबनिया धोये चाहे सारी उमरिया।
बिना रंगाये बाहर ना जाऊँ,
चाहे तो बीत जाए सारी उमरिया।
लाल न ओढूँ पीली न ओढूँ,
ओढूँगी श्याम तेरी काली कमलिया।
गागर जो भर दे, सिर पे जो धर दे,
चलके बता दे श्याम तेरी नगरिया।
बाई मीरा कहे गिरधर नागर,
हरि के चरण चित्त लागी रे लगनिया।
स्याम! मने चाकर राखो जी।
गिरधारी लाला! चाकर राखो जी।
चाकर रहसूं बाग लगासूं नित उठ दरसण पासूं।
ब्रिंदाबन की कुंजगलिन में तेरी लीला गासूं।।
चाकरी में दरसण पाऊँ सुमिरण पाऊँ खरची।
भाव भगति जागीरी पाऊँ, तीनूं बाता सरसी।।
मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, गल बैजंती माला।
ब्रिंदाबन में धेनु चरावे मोहन मुरलीवाला।।
हरे हरे नित बाग लगाऊँ, बिच बिच राखूं क्यारी।
सांवरिया के दरसण पाऊँ, पहर कुसुम्मी सारी।
जोगी आया जोग करणकूं, तप करणे संन्यासी।
हरी भजनकूं साधू आया ब्रिंदाबन के बासी।।
मीरा के प्रभु गहिर गंभीरा सदा रहो जी धीरा।
आधी रात प्रभु दरसन दीन्हें, प्रेमनदी के तीरा।।
सखी म्हांरो कानूडो कलेजे की कोर।।टेक।।
मोर मुगट पीताम्बर सोहै, कुण्डल की झकझोर।
बिन्द्रावन की कुँज गलिन में, नाचत नन्द किसोर।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, चरण कँवल चितचोर।।
राम मिलण के काज सखी,
मेरे आरति उर में जागी री।
तड़पत-तड़पत कल न परत है,
बिरहबाण उर लागी री।
निसदिन पंथ निहारूँ पिवको,
पलक न पल भर लागी री।
पीव-पीव मैं रटूँ रात-दिन,
दूजी सुध-बुध भागी री।
बिरह भुजंग मेरो डस्यो कलेजो,
लहर हलाहल जागी री।
मेरी आरति मेटि गोसाईं,
आय मिलौ मोहि सागी री।
मीरा ब्याकुल अति उकलाणी,
पिया की उमंग अति लागी री
राणाजी, म्हे तो गोविन्द का गुण गास्यां।
चरणामृत को नेम हमारे, नित उठ दरसण जास्यां॥
हरि मंदर में निरत करास्यां, घूंघरियां धमकास्यां।
राम नाम का झाझ चलास्यां भवसागर तर जास्यां॥
यह संसार बाड़ का कांटा ज्या संगत नहीं जास्यां।
मीरा कहै प्रभु गिरधर नागर निरख परख गुण गास्यां॥
म्हांरो जणम जणम रो साथी,
थाँने णा बिसार्यां दिन राती।।टेक।।
थां देख्यां बिण कल न पड़ताँ
जामे म्हारी छाती।
ऊचां चढ़चढ़ पंथ निहार्यां
कलप कलप अँडियां राती।
भी सागर जग बँधण झूंठां,
झूंठा कुलार न्याती।
पल पल थारो रूप निहारां
निरख निरखती मदमांती।
मीरां रे प्रभु गिरधरनागर,
हरि चरणां चित रांती।।
मोहि लागी लगन गुरुचरणन की।
चरण बिना कछुवै नाहिं भावै, जगमाया सब सपननकी॥
भौसागर सब सूख गयो है, फिकर नाहिं मोहि तरननकी।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर आस वही गुरू सरननकी॥
बसो मोरे नैनन में नंदलाल।
मोहनी मूरति सांवरि सूरति, नैणा बने बिसाल।
अधर सुधारस मुरली राजत, उर बैजंती-माल।।
छुद्र घंटिका कटि तट सोभित, नूपुर सबद रसाल।
मीरा प्रभु संतन सुखदाई, भगत बछल गोपाल।
पायो जी म्हें तो राम रतन धन पायो।
वस्तु अमोलक दी म्हारे सतगुरू, किरपा कर अपनायो॥
जनम-जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो।
खरच न खूटै चोर न लूटै, दिन-दिन बढ़त सवायो॥
सत की नाँव खेवटिया सतगुरू, भवसागर तर आयो।
'मीरा' के प्रभु गिरिधर नागर, हरख-हरख जस गायो॥
पानी में मीन प्यासी।
मोहे सुन सुन आवत हांसी॥
आत्मज्ञानबिन नर भटकत है।
कहां मथुरा काशी॥१॥
भवसागर सब हार भरा है।
धुंडत फिरत उदासी॥२॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर।
सहज मिळे अविनशी॥३॥